दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि इस बार दिवाली पर ग्रीन पटाखों (Green Crackers) के इस्तेमाल की अनुमति देने के लिए दिल्ली सरकार सुप्रीम कोर्ट से लिखित आग्रह करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि दीवाली भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा धार्मिक पर्व है, और दिल्ली के करोड़ों लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए सरकार ने यह निर्णय लिया है।
रेखा गुप्ता ने कहा कि सरकार जनभावनाओं का सम्मान करते हुए कानून और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की पक्षधर है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट को यह आश्वासन दिया जाएगा कि दिल्ली सरकार सभी दिशा-निर्देशों और मानकों का पूर्ण पालन करेगी। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सभी ग्रीन पटाखे केवल अधिकृत संस्थाओं द्वारा निर्मित और सक्षम विभागों से प्रमाणित हों।
ग्रीन पटाखे क्या होते हैं?
ग्रीन पटाखों की खोज सीएसआईआर-नीरी (CSIR-NEERI) यानी नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ने की थी। ये पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में बहुत कम धुआं और आवाज करते हैं। जहां सामान्य पटाखे करीब 160 डेसीबल तक शोर करते हैं, वहीं ग्रीन पटाखों की आवाज केवल 110 से 125 डेसीबल के बीच होती है।
इन पटाखों में एल्युमिनियम, पोटेशियम नाइट्रेट और सल्फर जैसे हानिकारक रसायन या तो बहुत कम मात्रा में होते हैं या बिल्कुल नहीं होते। इसमें विशेष डस्ट रिप्रेसेंट एजेंट्स डाले जाते हैं जो फूटने के बाद धूल को सोख लेते हैं। इसका मतलब है कि ये पटाखे हवा को प्रदूषित करने के बजाय उसे कुछ हद तक साफ रखने में भी मदद करते हैं।
क्यों जरूरी हैं ग्रीन पटाखे?
हर साल दिवाली के बाद दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में वायु प्रदूषण का स्तर गंभीर श्रेणी में पहुंच जाता है। प्रदूषण से बचाव और परंपराओं के सम्मान के बीच संतुलन के लिए ग्रीन पटाखों को एक बेहतर विकल्प माना जा रहा है। इन पटाखों से न केवल वायु और ध्वनि प्रदूषण कम होता है, बल्कि त्योहार की खुशियां भी बरकरार रहती हैं।
असली ग्रीन पटाखों की पहचान कैसे करें?
- NEERI और PESO (Petroleum and Explosives Safety Organisation) का लोगो पैकेट पर मौजूद होता है।
- QR कोड स्कैन करने पर उत्पाद की सत्यता और निर्माता की जानकारी मिलती है।
- ग्रीन पटाखों की पैकिंग पर स्पष्ट रूप से “Green Crackers” लिखा होता है।

