रेडियोलॉजी में बढ़ा AI का इस्तेमाल, फायदे के साथ डरा रहा खतरा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल हर फील्ड में तेजी से बढ़ रहा है और मेडिकल सेक्टर भी इससे अछूता नहीं है। खासकर रेडियोलॉजी (X-Ray, MRI, CT-Scan) में AI और बड़े लैंग्वेज मॉडल (LLMs) का इस्तेमाल डॉक्टरों को रिपोर्ट बनाने, मरीजों की जांच करने और अस्पताल का कामकाज आसान बनाने में मदद कर रहा है। हालांकि, इसके साथ मरीजों की प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं भी उठ रही हैं.

AI कैसे कर रहा मदद?

AI की मदद से एक्स-रे या एमआरआई की तस्वीरों को तेज़ी और सटीकता से पढ़ा जा सकता है। इससे डॉक्टर बेहतर और तेज़ फैसले ले सकते हैं। AI रिपोर्ट तैयार करने, गाइडलाइन खोजने और मरीजों के लिए फॉलो-अप शेड्यूल बनाने जैसे काम भी कर सकता है.

सबसे बड़ी दिक्कत – डेटा सुरक्षा

विशेषज्ञों का कहना है कि जब AI मॉडल क्लाउड पर चलते हैं तो मरीजों की मेडिकल हिस्ट्री या रिपोर्ट विदेश तक जा सकती है, जिससे प्राइवेसी खतरे में पड़ती है। भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 कहता है कि मरीज की सहमति के बिना संवेदनशील डेटा विदेश नहीं भेजा जा सकता। डॉक्टरों का सुझाव है कि AI मॉडल को लोकल सर्वर या अस्पताल के अंदर ही चलाना चाहिए, ताकि डेटा सुरक्षित रहे.

सुरक्षित इस्तेमाल का 3-स्टेप रोडमैप

  1. Pre-deployment: AI सिस्टम लॉन्च से पहले सुरक्षा और सटीकता की पूरी जांच.
  2. Deployment: अस्पताल में सीमित स्तर पर नियंत्रित उपयोग.
  3. Post-deployment: लगातार मॉनिटरिंग और तुरंत सुधार.

डॉक्टरों की जगह नहीं, मदद करेगा AI

विशेषज्ञों का कहना है कि AI का मकसद डॉक्टरों की जगह लेना नहीं है, बल्कि उन्हें बेहतर निर्णय लेने में मदद करना है। अंतिम फैसला हमेशा रेडियोलॉजिस्ट के पास ही रहेगा.


रोबोटिक नी रिप्लेसमेंट सर्जरी – आधुनिक लेकिन बीमा कवरेज में कमी

खराब घुटनों के इलाज में रोबोटिक नी रिप्लेसमेंट सर्जरी मरीजों के लिए वरदान साबित हो रही है। इसमें छोटे चीरे लगते हैं, कम खून बहता है और मरीज जल्दी रिकवर होता है। लेकिन बीमा कवरेज न मिलने से यह तकनीक सभी तक नहीं पहुंच पा रही.

2019 में IRDAI ने आधुनिक इलाज को बीमा योजनाओं में शामिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन अब भी कई बीमा कंपनियां रोबोटिक सर्जरी का पूरा खर्च कवर नहीं कर रहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और बीमा कंपनियों को मिलकर इसे स्टैंडर्ड केयर की तरह शामिल करना चाहिए, ताकि यह इलाज केवल अमीरों तक सीमित न रहकर हर मरीज तक पहुंच सके.

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