
गुजरात की शिक्षा व्यवस्था को लेकर नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट ने कई चिंताजनक और चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार राज्य की 2,936 सरकारी स्कूलें केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रही हैं। इन स्कूलों में वही एक शिक्षक पहली कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक के सभी बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी निभा रहा है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना करना बेहद कठिन है।
एक ही शिक्षक पर कई कक्षाओं का बोझ होने से छात्रों को व्यक्तिगत ध्यान नहीं मिल पाता। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में यह समस्या और भी गंभीर रूप ले चुकी है। कई स्कूलों में शिक्षक को पढ़ाई के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य, सरकारी योजनाओं का रिकॉर्ड और अन्य जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं। इससे पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है।
रिपोर्ट में एक और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है। गुजरात में 63 ऐसी सरकारी स्कूलें हैं, जहां एक भी छात्र मौजूद नहीं है, लेकिन वहां 78 शिक्षक नियमित रूप से वेतन प्राप्त कर रहे हैं। एक ओर जहां हजारों स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है, वहीं दूसरी ओर खाली स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति प्रशासनिक व्यवस्था और संसाधनों के सही उपयोग पर सवाल खड़े करती है।
राज्य में बुनियादी शैक्षणिक ढांचे की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में करीब 42,000 क्लासरूम की कमी है। कई स्कूलों में बच्चों को खुले में या एक ही कमरे में अलग-अलग कक्षाओं के साथ पढ़ाई करनी पड़ती है। इससे न केवल बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, बल्कि शिक्षकों के लिए भी पढ़ाना बेहद कठिन हो जाता है।
सबसे बड़ी चिंता राज्य में बढ़ती ड्रॉपआउट दर को लेकर है। रिपोर्ट के अनुसार कक्षा 10 तक पहुंचने से पहले ही 2.3 लाख से अधिक बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। यह आंकड़ा लगभग 27.6 प्रतिशत ड्रॉपआउट रेट को दर्शाता है। आर्थिक कठिनाइयां, शिक्षा में रुचि की कमी, पारिवारिक जिम्मेदारियां, स्कूलों में सुविधाओं का अभाव और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न मिलना इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में इसका असर राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास पर भी पड़ सकता है। शिक्षकों की भर्ती, स्कूलों में आधारभूत सुविधाओं का विकास, नए क्लासरूम निर्माण और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना अब सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।
नीति आयोग की यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़ी गंभीर चुनौतियों की चेतावनी भी है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इन समस्याओं के समाधान के लिए कितनी तेजी और गंभीरता से कदम उठाती है।
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