
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते खतरे के बीच संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates) ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लेते हुए तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC और OPEC+ से बाहर होने की घोषणा की है। लगभग 60 वर्षों तक इस संगठन का हिस्सा रहने के बाद यूएई का यह कदम वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
OPEC, जिसकी स्थापना 1960 में हुई थी, वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को नियंत्रित करने वाला प्रमुख संगठन रहा है। इसमें Saudi Arabia, Iran, Iraq, Kuwait और Venezuela जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश शामिल हैं। OPEC+ में Russia जैसे देश भी शामिल हैं, जो उत्पादन नीति को प्रभावित करते हैं।
यूएई के इस फैसले के पीछे मुख्य कारण उत्पादन कोटा को लेकर असंतोष और अपनी उत्पादन क्षमता को स्वतंत्र रूप से बढ़ाने की रणनीति मानी जा रही है। यूएई लंबे समय से OPEC द्वारा निर्धारित सीमाओं से अधिक तेल उत्पादन करना चाहता था, जिससे उसकी आर्थिक वृद्धि को गति मिल सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, यूएई के बाहर निकलने से OPEC अपनी लगभग 15 प्रतिशत उत्पादन क्षमता खो सकता है। इससे संगठन की एकजुटता कमजोर होगी और नेतृत्व की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सऊदी अरब पर आ जाएगी। यह स्थिति वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता को बढ़ा सकती है।
इस घटनाक्रम का समय भी बेहद महत्वपूर्ण है। Strait of Hormuz, जो विश्व के लगभग 20% तेल व्यापार का मार्ग है, वहां पहले से ही तनाव बना हुआ है। यदि यहां अवरोध बढ़ता है, तो वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और तेल कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
भारत पर प्रभाव
भारत जैसे तेल आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार साबित हो सकती है। एक ओर, यदि यूएई OPEC से बाहर होकर उत्पादन बढ़ाता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिससे भारत को राहत मिलेगी।
वहीं दूसरी ओर, यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ता है या आपूर्ति बाधित होती है, तो तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं और महंगाई पर दबाव बढ़ेगा।
भारत और यूएई के बीच मजबूत आर्थिक संबंध हैं। यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और निवेश का एक बड़ा स्रोत भी है। ऐसे में इस फैसले का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापार और कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।
यूएई का OPEC से बाहर होना केवल एक संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक बड़ा मोड़ है। यह कदम भविष्य में तेल बाजार के नियंत्रण, मूल्य निर्धारण और भू-राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अन्य देश भी इस राह पर चलते हैं या OPEC अपनी एकजुटता बनाए रख पाता है।
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