
नई दिल्ली: 16 अप्रैल से शुरू होने वाले संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण को लेकर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकता है। केंद्र सरकार वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से 33% महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। यह पहल नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लाई गई है, जिसे वर्ष 2023 में पारित किया गया था।
सरकार की योजना है कि लोकसभा सीटों का पुनर्गठन कर महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया जाए। सूत्रों के अनुसार, हर राज्य में मौजूदा सीटों में लगभग 50% तक वृद्धि का प्रस्ताव है। यह वृद्धि पूरी तरह अनुपातिक (प्रोपोर्शनल) आधार पर होगी, जिससे किसी भी राज्य के साथ अन्याय न हो।
हालांकि, इस प्रस्ताव ने राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी है। विपक्षी दलों का आरोप है कि महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन (Delimitation) के जरिए सत्ता संतुलन बदलने की कोशिश की जा रही है। खासकर दक्षिण भारत के राज्यों तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल और कर्नाटक में इस मुद्दे को लेकर चिंता जताई जा रही है।
इन राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, ऐसे में नए परिसीमन से उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है। वहीं उत्तर भारत के राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना जताई जा रही है, जिससे सत्ता का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
विधेयक के तहत लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने का प्रस्ताव है। इसमें करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। इसके अलावा, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग की महिलाओं को भी आरक्षण का लाभ मिलेगा। यह आरक्षण 15 वर्षों के लिए लागू होगा और सीटों का रोटेशन भी किया जाएगा।
सरकार का कहना है कि परिसीमन का आधार अंतिम जनगणना होगा और सभी राज्यों के हितों का ध्यान रखा जाएगा। हालांकि विपक्ष इस पर स्पष्टता की मांग कर रहा है और सर्वदलीय सहमति पर जोर दे रहा है।
राजनीतिक दृष्टि से यह सत्र बेहद अहम माना जा रहा है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस समेत कई दल महिला आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन वे परिसीमन के जरिए सत्ता संतुलन में बदलाव को लेकर सतर्क हैं।
संसद में इस मुद्दे पर करीब 25 से 28 घंटे तक चर्चा होने की संभावना है। 16 और 17 अप्रैल को लोकसभा में और 18 अप्रैल को राज्यसभा में इस पर बहस होगी।
यह सिर्फ महिला सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के ढांचे और सत्ता के संतुलन से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि इस ऐतिहासिक पहल पर राजनीतिक सहमति बनती है या टकराव और गहराता है।
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