
गांधीनगर, 14 मई : दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा Statue of Unity के आसपास रहने वाले लगभग 1000 आदिवासी परिवार अब रसोई गैस के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। राज्य सरकार की ओर से इन परिवारों को बायोगैस प्लांट उपलब्ध कराने की योजना का सकारात्मक असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2025 में एकता नगर में आयोजित राष्ट्रीय एकता दिवस परेड के दौरान स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आसपास रहने वाले 1000 आदिवासी परिवारों के घरों में बायोगैस प्लांट स्थापित करने की घोषणा की थी। इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ते हुए एलपीजी और लकड़ी जैसे पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करना है।
यह योजना नर्मदा जिले की गरुड़ेश्वर तहसील की 38 ग्राम पंचायतों के 89 गांवों में लागू की जा रही है। गरुड़ेश्वर तहसील पंचायत द्वारा संचालित इस योजना की निगरानी जिला ग्राम विकास एजेंसी (डीआरडीए) कर रही है।
मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल के मार्गदर्शन में राज्य सरकार ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए विभिन्न योजनाओं को तेजी से लागू कर रही है। गुजरात में वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए बायोगैस, सौर ऊर्जा और अन्य हरित ऊर्जा परियोजनाओं पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित वाघपुरा गांव के निवासी रवि तड़वी ने बताया कि बायोगैस प्लांट लगने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि अब उन्हें एलपीजी सिलेंडर की चिंता नहीं रहती और रोजाना स्वच्छ ईंधन उपलब्ध हो जाता है। साथ ही, प्लांट से निकलने वाली स्लरी खेती के लिए जैविक खाद के रूप में उपयोगी साबित हो रही है, जिससे फसल उत्पादन में भी वृद्धि हो रही है।
स्थानीय निवासी चंदू तड़वी ने बताया कि इस योजना से महिलाओं को सबसे अधिक लाभ मिला है। पहले महिलाओं को खेतों में काम करने के बाद लकड़ी इकट्ठा करने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता था। चूल्हे के धुएं से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी होती थीं, लेकिन अब बायोगैस के उपयोग से उन्हें धुएं से राहत मिली है और रसोई का काम भी आसान हो गया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक 665 से अधिक बायोगैस प्लांट स्थापित किए जा चुके हैं, जबकि बाकी प्लांट लगाने का कार्य तेजी से जारी है। प्लांट की स्थापना का पूरा खर्च राज्य सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है। लाभार्थियों को केवल गड्ढा खोदने के लिए श्रमदान करना पड़ता है।
बायोगैस प्लांट से न केवल स्वच्छ ईंधन मिल रहा है, बल्कि खेती के लिए जैविक खाद भी उपलब्ध हो रही है। इससे रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है।
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