
‘गॉडज़िला एल नीनो’ शब्द हाल के वर्षों में मौसम वैज्ञानिकों और जलवायु विशेषज्ञों के बीच काफी चर्चा में रहा है। यह कोई आधिकारिक वैज्ञानिक नाम नहीं है, बल्कि अत्यंत शक्तिशाली एल नीनो (El Niño) की स्थिति को दर्शाने के लिए उपयोग किया जाने वाला लोकप्रिय शब्द है। जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से के समुद्री जल का तापमान सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाता है, तब एल नीनो की स्थिति बनती है। यदि यह असामान्य गर्माहट अत्यधिक तीव्र हो जाए, तो उसे अनौपचारिक रूप से ‘गॉडज़िला एल नीनो’ कहा जाता है।
एल नीनो का प्रभाव केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरी दुनिया के मौसम चक्र को प्रभावित करता है। समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि के कारण वैश्विक पवन प्रणाली में बदलाव आता है। इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा होती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में सूखा और गर्मी की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
भारत के संदर्भ में एल नीनो का विशेष महत्व है क्योंकि इसका सीधा प्रभाव दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है। भारतीय मानसून देश की कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। एल नीनो की स्थिति में भारत की ओर आने वाली मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं, जिससे सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि किसान, मौसम वैज्ञानिक और नीति निर्माता एल नीनो की गतिविधियों पर लगातार नजर रखते हैं।
वर्ष 2026 को लेकर कई जलवायु मॉडल संकेत दे रहे हैं कि प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति फिर से मजबूत हो सकती है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है, तो भारत में मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में देश के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की जा सकती है। हालांकि, मानसून केवल एल नीनो से ही प्रभावित नहीं होता, बल्कि हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), समुद्री तापमान, स्थानीय मौसम प्रणालियां और अन्य वैश्विक कारक भी इसकी तीव्रता तय करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2026 में ‘गॉडज़िला एल नीनो’ जैसी स्थिति विकसित होती है, तो कृषि उत्पादन, जल भंडारण और पेयजल उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। वर्षा में कमी के कारण फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका रहेगी। इसके अलावा, कई राज्यों में गर्मी की तीव्रता भी बढ़ सकती है।
हालांकि अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और मौसम पूर्वानुमानों में समय के साथ बदलाव संभव है। वैज्ञानिक लगातार महासागरीय और वायुमंडलीय आंकड़ों का अध्ययन कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में जारी होने वाले अपडेट ही यह तय करेंगे कि 2026 का मानसून कितना प्रभावित होगा।
फिलहाल, ‘गॉडज़िला एल नीनो’ की संभावित स्थिति को देखते हुए कृषि क्षेत्र, जल प्रबंधन एजेंसियों और सरकारों के लिए सतर्क रहना आवश्यक है। समय रहते की गई तैयारी संभावित चुनौतियों के प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकती है।
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